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महर्षि कश्यप

सप्तऋषियों में प्रमुख – कश्यप ऋषि (Kashyap Rishi)

Main among the Saptarishis – Kashyap Rishi

प्राचीन वैदिक सप्त ऋषियों (ऋषि वशिष्ठ, कश्यप ऋषि, अत्रि ऋषि, ऋषि जमदग्नि, ऋषि गौतम, ऋषि विश्वामित्र और ऋषि भारद्वाज) में कश्यप ऋषि को प्रमुख ऋषि माना जाता है। महर्षि कश्यप अपने श्रेष्ठ गुणों, प्रताप एवं तप के बल पर श्रेष्ठतम महाविभूतियों में गिने जाते थे।

अनेक पुराणों, ग्रंथों, प्राचीन पुस्तकों, संहिताओं तथा ॠग्वेदों में कश्यप ऋषि के बारें में बताया गया है। पुराणों के अनुसार ऋषि कश्यप ने ऐतरेय ब्राह्मण के राजा विश्वकर्मभौवन का अभिषेक कराया था, इतना ही नहीं, कश्यप ऋषि के वंशजों के द्वारा ही सृष्टि का प्रचार और प्रसार हुआ।

पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से ऋषि मरीचि ने अपनी लालसा या इच्छा से कश्यप नामक प्रजापति पुत्र को उत्पन्न किया था और इनकी माता कर्दम ऋषि की पुत्री व कपिल देव की बहन ‘कला’ थी।

इतिहास और मान्यताएं

प्राचीन ग्रंथों और पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी सबसे पहले पृथ्वी पर प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने दक्ष प्रजापति को जन्म दिया। दक्ष प्रजापति ने ब्रह्मा जी के कहने पर अपनी पत्नी वीरणी के गर्भ से 60 पुत्रियों को जन्म दिया, जिनमे से 13 पुत्रियों से महर्षि कश्यप ने विवाह किया।

कुछ पुराणों और श्रीमद् भागवत (Shrimad Bhagwat) के अनुसार दक्ष प्रजापति ने अपनी 60 पुत्रियों में से 10 पुत्रियों का विवाह धर्म के साथ, 27 पुत्रियों का विवाह चन्द्रमा के साथ, 13 पुत्रियों का विवाह महर्षि कश्यप के साथ, 2 पुत्रियों का विवाह भूत के साथ, 2 पुत्रियों का विवाह अंगीरा के साथ, 2 पुत्रियों का विवाह कृशाश्व के साथ किया, बाकी 4 पुत्रियों का ब्याह भी महर्षि कश्यप से करवाया।

इस प्रकार उनकी यें 17 पत्नियाँ (अदिति, दिति, दनु, अनिष्ठा, काष्ठा, सुरसा, इला, मुनि, सुरभि, कद्रू, विनता, यामिनी, ताम्रा, तिमि, क्रोधवशा, सरमा, पातंगी) हो गई।

उसके पश्चात कश्यप ऋषि ने दिति के गर्भ से हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष नामक दो पुत्र और सिंहिका नामक पुत्री को जन्म दिया।
इसके अलावा दिति के गर्भ से 49 अन्य पुत्रों का जन्म भी हुआ था, जिन्हें मरुन्दण कहा जाता था।

महर्षि कश्यप की संतानें

अदिति से आदित्य (देवता), दिति से दैत्य, दनु से दानव, काष्ठा से अश्व आदि, अनिष्ठा से गन्धर्व, सुरसा से राक्षस, इला से वृक्ष, मुनि से अप्सरागणय , क्रोधवशा से सर्प, सुरभि से गौ और महिष, सरमा से श्वापद (हिंस्त्र पशु), ताम्रा से श्येन-गृध्र, तिमि से यादोगण (जलजन्तु), विनता से गरुड़ और अरुण, कद्रु से नाग, पतंगी से पतंग, यामिनी से शलभ।

पृथ्वी का संतुलन बनाए रखने के लिए इन सभी का होना बहुत आवश्यक है और इन सभी ने कश्यप ऋषि के माध्यम से जन्म लिया और अपना-अपना कर्तव्य निभाया, इस प्रकार कश्यप ऋषि संपूर्ण सृष्टि के सृजनकर्ता के रूप में भी जानें जाते है।

श्रीमद् भागवत और पुराणों के अनुसार हम सब भी महृषि कश्यप की संतान है।

महत्व

लोगों में महर्षि कश्यप का बहुत ही महत्व है, लोग इन्हें अपना गुरु मानते है और महर्षि कश्यप जयंती (Maharishi Kashyap Jayanti) पर लोग बहुत ही हर्षोउल्लाश तथा बहुत ही धूम धाम से कश्यप ऋषि की जयंती मनाते है। भारत के अनेक जगहों में इस दिन बड़े पैमाने पर शोभायात्रा निकाली जाती है। यह शोभायात्रा पूरे गांव तथा शहर में चलाई जाती है। इस दिन मंदिरों में यज्ञ तथा हवन किए जाते है और बहुत दूर-दूर से लोग आकर कश्यप ऋषि की जयंती मनाते है अर्थात उनकी पूजा करते है।

“कश्यप-संहिता” (Kashyapa Samhita) जैसी महान रचना भी महर्षि कश्यप द्वारा रचि गई है। यह आयुर्वेदिक संहिता ग्रन्थों में बहुत प्राचीनतम तथा महत्वपूर्ण है।

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