• राजस्थान की रैली दौरान पीएम मोदी ने लाउडस्पीकर नियमों का किया पालन
  • रूस के खिलाफ UNSC में अमेरिका लाया प्रस्ताव
  • मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक से दूसरे कांग्रेस अध्यक्ष हो जायेंगे, अगर इस बार जीत हासिल करले
  • 5G सेवा का आज होगा शुभारम्भ, पीएम मोदी करेंगे शुरुआत

Jag Khabar

Khabar Har Pal Kee

बद्रीनाथ

धामों में धाम – बद्रीनाथ धाम

Dham in Dham – Badrinath Dham

बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु का पूजनीय निवास स्थान, चार धाम तीर्थ यात्रा के स्थानों में सबसे पवित्र मंदिरों में से एक है। अन्य धामो में पुरी, द्वारका और रामेश्वरम शामिल हैं।

बद्रीनाथ मंदिर को बद्रीनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह पवित्र स्थान हमारे देश (भारत) के उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित है। यह पवित्र स्थान गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ चार तीर्थ-स्थलो में से एक हैं। इन तीर्थ-स्थलो को चार धाम के नाम से जाना जाता है।

बद्रीनाथ मंदिर प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता हैं, इसलिये यह उत्तरी भारत में की जाने वाली धार्मिक यात्रा का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है।

गढ़वाल हिमालय की तीर्थ यात्रा गंगोत्री, यमुनोत्री और केदारनाथ से होकर बद्रीनाथ इस यात्रा का सबसे प्रसिद्ध और अंतिम पड़ाव है। बद्रीनाथ धाम तक का सड़क मार्ग काफी आसान है और बद्रीनाथ मंदिर तक आसानी से चलकर पहुँचा जा सकता है। बद्रीनाथ से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर भारत का अंतिम गांव माणा स्थित है, जहाँ पर भारत की सीमा समाप्त होती है और तिब्बत की सीमा शुरु होती है।

बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना (Establishment of Badrinath Temple)

बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना आदि शंकराचार्य द्वारा की गयी थी। जब उन्होंने भगवान बद्री की सालिग्राम मूर्ति को अलकनंदा नदी के अंदर पानी में डूबा हुआ पाया तो उन्होंने भगवान बद्री की मूर्ति को तप्त कुंड के समीप एक गुफा में स्थापित कर दिया।

सोलहवीं शताब्दी के समय, गढ़वाल के राजा ने भगवान की मूर्ति को रखने के लिए एक मंदिर बनवाया था। मंदिर की लंबाई लगभग 50 फीट (15 मीटर) है। मंदिर के शीर्ष पर एक छोटा गुंबद है। मंदिर का अग्रभाग पत्थर से बना हुआ है, जिसमें धनुष के आकार की खिड़कियां हैं। मंदिर के बाहर एक चौड़ी सीढ़ी एक ऊंचे धनुष के आकार वाले प्रवेश द्वार तक जाती है, जो मंदिर मुख्य प्रवेश द्वार है।

मंदिर की वास्तुकला एक बौद्ध विहार (मंदिर) से मेल खाती है, जिसका आगे का भाग चमकीले रंग का है। मंदिर के ठीक अंदर, एक विशाल खंभों वाला हॉल है जो गर्भ गृह, या मुख्य क्षेत्र की तरफ़ जाता है। मंदिर की दीवारें और खंभे पर नक्काशी की हुई है।

सर्दियों के मौसम के समय पांडुकेश्वर (चमोली जिले) में योगध्यान बद्री स्थान में भगवान बद्री की मूर्ति को स्थानांतरित कर दिया जाता है।

बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कथाएं (Stories related to Badrinath Dham)

बद्रीकाश्रम (Badrikashram)

बद्रीनाथ मंदिर के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हैं। एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा – भगवान विष्णु गहन ध्यान में थे और वहाँ के गंभीर मौसम की स्थिति नहीं जानते थे। भगवान विष्णु को सूर्य की तपती धूप से सुरक्षित करने के लिए भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी ने बद्री वृक्ष का रूप लेकर उनके ऊपर वृक्ष की शाखाओ को फैला दिया। यह देखकर, भगवान विष्णु देवी लक्ष्मी की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने इस स्थान को बद्रीकाश्रम का नाम दिया।

भगवान नारायण की बद्रीनाथ में ध्यान करने की इच्छा (Lord Narayan’s desire to Meditate at Badrinath)

एक अन्य कथा है कि, एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती बद्रीनाथ में तपस्या में लीन थे। तब भगवान विष्णु एक छोटे से बालक के रूप में आये और जोर-जोर से रोते हुए उनके ध्यान में बाध्य डालने लगे। उनको रोते हुए देखकर देवी पार्वती ने उनसे उनके रोने का कारण पूछा, तो उस बालक ने उत्तर दिया कि वह इस स्थान (बद्रीनाथ) में ध्यान करना चाहता हैं। भगवान नारायण को उस बालक भेष में देखकर भगवान शिव और देवी पार्वती उस स्थान (बद्रीनाथ) को छोड़कर केदारनाथ चले गए।

पवित्र अलकनंदा नदी का उद्गम स्थल (Origin of Holy River Alaknanda)

एक और पौराणिक कथा के अनुसार सबसे पवित्र गंगा नदी भगीरथ के अनुरोध पर मानवो को पापों और कष्टों के से मुक्त करने के लिए पृथ्वी पर आने को तैयार थी। पृथ्वी पर आते समय गंगा नदी की तीव्रता इतनी तेज़ थी कि वह पूरी पृथ्वी को अपने अथाह जल में डुबो सकती थी। पृथ्वी को बचाने लिए भगवान शिव ने गंगा नदी को अपनी जटा में समा लिया और अंततः गंगा नदी बारह पवित्र नदियों में बँट गई। बद्रीनाथ मंदिर से बहने वाली पवित्र अलकनंदा नदी उन नदियों में से एक थी।

कथा नर और नारायण की (Story of Nar and Narayan)

धर्म के दो पुत्र नर और नारायण पवित्र हिमालय के बीच अपने आश्रम स्थापित करना चाहते थे और अपने धार्मिक आधार को विस्तृत करना चाहते थे। अपने आश्रम के लिए एक उचित स्थान खोजने के दौरान, उन्होंने बृधा बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री की खोज की। आखिर में वे ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ पवित्र अलकनंदा नदी के पास दो आकर्षक (ठंडे और गर्म) झरने थे। इस सुन्दर स्थान को देखकर उन्हें अत्यंत प्रसन्नता प्राप्त हुई और उन्होंने इस जगह का नाम बद्री विशाल रखा। इस प्रकार बद्रीनाथ धाम अस्तित्व में आया।

बद्रीनाथ धाम के अन्य दर्शनीय स्थल (Other Attractions of Badrinath Dham)

तप्त कुंड (Tapt Kund)

मंदिर के नीचे, एक प्राकृतिक कुंड है। इस कुंड के जल में अनेक चिकित्सीय गुण पाये जाते है। भगवान बद्रीनाथ के पवित्र मंदिर में प्रवेश से पहले भक्तजन कुंड के पवित्र और गर्म पानी में डुबकी लगाते है। इस तप्त कुंड के समीप पांच शिलाखंड भी मिलते हैं, जो प्राचीन कथा के अनुसार महर्षि नारद, वराह, गरूड़, नरसिंह और मार्कंडेय हैं।

ब्रह्मा कपाल (Brahma Kapal)

बद्रीनाथ धाम से करीब पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित स्थान ब्रह्मकपाल में पवित्र अलकनंदा नदी के तट पर एक विशाल पत्थर (शिला) मौजूद है, यहाँ पर पितरों के उद्धार के लिए हवन कुंड में हवन किया जाता है व पिंडदान किया जाता है।

चरणपादुका (Charan Paaduka)

बद्रीनाथ से लगभग 3 किलोमीटर की पत्थरों से भरी खड़ी चढ़ाई आपको चरणपादुका तक ले जाएगी। चरणपादुका एक चट्टान है जिसके बारे में यह माना जाता है कि जब यह भगवान विष्णु वैकुंठ से पृथ्वी पर आये थे, तो यह भगवान विष्णु के पैरों के निशान है।

नीलकंठ चोटी (Neelkanth Peak)

नीलकंठ चोटी का नाम भगवान शिव के नाम पर है, इस चोटी की ऊंचाई लगभग 6,597 मीटर है। बर्फ से ढकी होने के वजह से चोटी की शोभा बढ़ जाती है और अपनी ऊंचाई से यह सूर्य की पहली किरण प्राप्त करती है।

शेषनेत्र (Sheshanetr)

पवित्र अलकनंदा नदी के विपरीत तट पर, बद्रीनाथ मंदिर से लगभग 1.5 किलोमीटर की दूरी पर दो मौसमी झीलों के बीच एक विशाल चट्टान मौजूद है, जो विष्णु भगवान के प्रसिद्ध सर्प शेषनाग की छाप देती है। यहाँ पर एक प्राकृतिक निशान मौजूद है, जो शेषनाग की आंख की तरह प्रतीत होता है। ऐसा माना जाता है कि यहाँ से शेषनाग, भगवान बद्रीनाथ के पवित्र मंदिर की निगरानी व सुरक्षा करता है।

माता मूर्ति मंदिर (Mata Murti Mandir)

यह मंदिर बद्रीनाथ मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर की दूरी पर पवित्रअलकनंदा नदी के किनारे पर स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार नर और नारायण की माता का माना जाता है। यह उनकी प्रार्थना थी, जिससे विष्णु भगवान उनके गर्भ से जन्म लेने के लिए मान गये। प्रत्येक वर्ष, सितंबर माह में तीर्थ यात्री माता मूर्ति का मेला (मेले) में शामिल होने के लिए यहाँ दूर-दूर से आते हैं।

बद्रीनाथ धाम पहुँचने का मार्ग (Road to reach Badrinath Dham)

सड़क मार्ग (by road)

सड़क मार्ग से हरिद्वार से बद्रीनाथ तक की दूरी लगभग 315 किलोमीटर की है। मार्ग:-

हरिद्वार – ऋषिकेश – देवप्रयाग – श्रीनगर – रुद्रप्रयाग – कर्णप्रयाग – नंदप्रयाग – चमोली – गरूर गंगा – जोशीमठ – विष्णुप्रयाग – गोविंदघाट – पांडुकेश्वर – हनुमानचट्टी – बद्रीनाथ।

रेल मार्ग (by train)

रेल के द्वारा आप ऋषिकेश तक पहुँच पायेंगे, आगे का मार्ग आपको सड़क मार्ग से तय करना होगा।

हवाई मार्ग (by air)

हवाई जहाज़ के द्वारा आप जॉली ग्रांट एयरपोर्ट, देहरादून तक पहुँच जायेंगे, जहाँ से आगे का मार्ग आपको सड़क मार्ग से तय करना होगा।

बद्रीनाथ धाम यात्रा का उचित समय (Best time to Badrinath Dham Yatra)

बद्रीनाथ जाने का सबसे उचित समय अप्रैल/मई से जून के महीने में और सितंबर से अक्टूबर/नवंबर महीने तक ही है।

मानसून के समय के दौरान यात्रा करने से बाढ़, भूस्खलन और अन्य मानसून संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता हैं। सर्दियों में अत्यधिक ठंड और हिमपात की वज़ह से मार्ग बंद हो जाते है।

.

Continue in...